जब विचार रुकते नहीं....
- Prashanth B
- Jan 23
- 3 min read
नमस्कार मित्रों!
क्या आपका मन कभी शांत नहीं रहता?
विचार एक के बाद एक आते रहते हैं।
आप उन्हें रोक नहीं पाते।
सोने जाएं तो विचार।
काम करते समय विचार।
आराम करना चाहें तो भी विचार!
इस समस्या का एक समाधान है।
लेकिन वह विचारों को रोकना नहीं है!
समस्या का विवरण
जब विचार रुकते नहीं तो क्या होता है?
हमारा मन लगातार चलता रहता है।
कल की गलतियां।
कल की चिंताएं।
दूसरे हमारे बारे में क्या सोचते हैं।
करने वाले काम।
जब यह सब एक साथ आता है, हमारा मन विश्राम नहीं करता।
हम कोशिश करते हैं।
"विचारों को रोकना है!"
लेकिन होता क्या है?
और भी ज्यादा विचार!
क्योंकि "विचारों को रोकना है" यह भी एक विचार है, है ना?
तो समाधान क्या है?
दृग् दृश्य विवेक - आप विचार नहीं हैं
यहां एक महत्वपूर्ण सत्य है।
आप विचार नहीं हैं।
आप वह जागरूकता हैं जो विचारों को जानती है।
हमारा वेदांत इसे "दृग् दृश्य विवेक" कहता है।
द्रष्टा और दृश्य का विवेक।
इसे सरलता से समझते हैं।
मान लीजिए आप अभी एक पेड़ देख रहे हैं।
आपको उस पेड़ की जागरूकता है।
लेकिन वह पेड़ आप नहीं हैं, है ना?
आप देखने वाले हैं।
पेड़ देखा जाने वाला है।
वैसे ही विचार।
आपको विचारों की जागरूकता है।
"अरे, मुझे यह विचार आया" - आप यह कहते हैं।
तो उस विचार को कौन देख रहा है?
क्या विचार खुद को देख सकता है?
नहीं!
एक द्रष्टा होना चाहिए जो विचार को देखता है।
वह द्रष्टा आप हैं।
आप देखने वाले हैं।
विचार देखे जाने वाले हैं।
वह शुद्ध जागरूकता आपका असली स्वरूप है।
विचार आकाश में गुजरते बादलों की तरह हैं।
बादल आएं या जाएं, आकाश वही रहता है।
आप वह आकाश हैं।
शाश्वत। शांत। विशाल।
जागरूकता में विश्राम
जब हम इस जागरूकता में विश्राम करते हैं तो क्या होता है?
विचार धीमे हो जाते हैं।
मंद हो जाते हैं।
क्योंकि हम उनसे लड़ना बंद कर देते हैं।
हम उन्हें पकड़े रखना बंद कर देते हैं।
विचार हों तो भी कोई बात नहीं!
वे हमें परेशान नहीं करते।
क्योंकि हम उनके साथ तादात्म्य नहीं करते।
यह ऐसा है जैसे सड़क के किनारे खड़े होकर वाहन देखना।
वाहन गुजर जाते हैं।
लेकिन आप हर वाहन में नहीं कूदते!
कहानी - ध्यानी और मित्र
इस विषय को स्पष्ट करने के लिए एक छोटी कहानी।
एक व्यक्ति विचारों से परेशान होकर अपने ध्यानी मित्र के पास आता है।
"मित्र, इन विचारों को कैसे रोकूं?
मेरा मन एक पल भी शांत नहीं रहता!"
ध्यानी मुस्कुराते हुए कहता है।
"तुम विचार नहीं हो।
तुम वह जागरूकता हो जो उन्हें जानती है।
बस देखो। लड़ो मत।"
उस व्यक्ति को समझ आता है।
वह अभ्यास करना शुरू करता है।
दूसरे दिन वह उत्साह से ध्यानी से मिलता है।
"मित्र! तुम्हारी सलाह काम कर गई!
मेरा मन अब भाग नहीं रहा।
मैं बहुत शांत हूं!"
ध्यानी धीरे से जवाब देता है।
"अच्छा है।
लेकिन एक बात याद रखो।
तुम वह शांति भी नहीं हो।
तुम उस शांति की जागरूकता हो।
तभी असली स्वतंत्रता।"
ध्यान - जागरूकता में विश्राम
अब हम सब मिलकर दो मिनट इस जागरूकता में विश्राम करें।
अपनी आंखें बंद करें।
या कोमल दृष्टि रखें।
अब ध्यान दें।
आपमें कौन से विचार हैं?
उन्हें बदलने की कोशिश मत करें।
केवल ध्यान दें।
कौन इन विचारों को देख रहा है?
वह देखने वाला आप हैं।
उस जागरूकता में विश्राम करें।
उस विशाल जागरूकता में।
उस शांत जागरूकता में।
विचार आएं तो भी कोई बात नहीं।
उन्हें गुजर जाने दें।
आप बस आकाश की तरह रहें।
शांति से।
विशालता से।
स्वतंत्रता से।
धीरे से आंखें खोलें।
समापन
मित्रों।
विचार समस्या नहीं हैं।
उनके साथ तादात्म्य समस्या है।
आप विचार नहीं हैं।
आप वह शुद्ध जागरूकता हैं जो विचारों को जानती है।
इस सत्य को याद रखें।
रोज अभ्यास करें।
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शांति से रहें।
जागरूकता में विश्राम करें।
नमस्ते!
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