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थके हुए मनों के लिए: बैठें, सांस लें, होश के साथ...

  • Writer: Prashanth B
    Prashanth B
  • Jan 17
  • 2 min read

हम सभी बहुत थक चुके हैं… चूर हो गए हैं...

शरीर की थकान… मन की थकान… आंखों की थकान… विचारों की थकान… भावनाओं की थकान...

कुछ तो होना चाहिए… कहीं तो पहुँचना है… कुछ तो बदलना है…

यह दबाव, हमें पता चले बिना ही, भीतर भर गया है...

इस पल, आप कहीं भी हों, कोई बात नहीं…

बिस्तर पर हो सकते हैं… कुर्सी पर बैठे हो सकते हैं… या ज़मीन पर…

अभी, इसी वक़्त, कुछ भी ठीक करने की ज़रूरत नहीं है। कुछ भी हासिल करने की ज़रूरत नहीं है।

सांस बाहर छोड़ें... सांस के साथ... शरीर की थकान बाहर निकालें... मन की थकान बाहर निकालें... सांस छोड़ें (निश्वास)...

एक और गहरी सांस लें... अब सांस के साथ सारा दबाव बाहर निकाल दें... सांस छोड़ें...

ये कुछ मिनट… हम कुछ भी न बदलें।

बस… जैसे हैं… वैसे ही रहें।

अपना ध्यान सांस की ओर मोड़ें।

सांस को अंदर आते हुए देखें (महसूस करें)…

सांस को बाहर जाते हुए देखें…

बदलें नहीं… नियंत्रित न करें…

बस ध्यान दें... अगर मन भटकता है… कोई बात नहीं।

अगर विचार आते हैं… कोई बात नहीं।

उन्हें धकेलें नहीं… लड़ें नहीं…

बस ध्यान दें… और फिर धीरे से वापस सांस पर लौट आएं...

इस पल में… आपमें कोई दोष नहीं है… आप टूटे हुए नहीं हैं… आप पीछे नहीं छूटे हैं… आप बस… थके हुए हैं। यह मानव स्वभाव है।

शरीर में हो रही संवेदनाओं पर ध्यान दें..

कंधों को थोड़ा ढीला छोड़ दें… चेहरे को ढीला होने दें… आंखों के पीछे का दबाव थोड़ा पिघलने दें…

एक धीमी सांस अंदर… और धीरे से बाहर…

यह सुकून (निरांत).. आपके लिए नया नहीं है। यह पहले से ही आप में है।

जब हम थोड़ा रुक कर ध्यान देते हैं, यह हमेशा वहीं होता है... आपके आने का इंतज़ार करता हुआ...

बस कुछ और पल… यूँ ही इस होश (अवेयरनेस) के साथ रहें...

यह सुकून आप ही हैं.. यह सुकून का होश आप ही हैं...


 
 
 

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